कलम की ताक़त बेबस हुई, सीएम योगी बने सहारा मीडियाकर्मियों की जगाईं उम्मीद

दशकभर से वेतन संकट झेल रहे सहारा मीडियाकर्मियों की पीड़ा सुनकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न्यायपूर्ण समाधान का आश्वासन दिया।

कलम की ताक़त बेबस हुई, सीएम योगी बने सहारा मीडियाकर्मियों की जगाईं उम्मीद
वेतन संकट झेल रहे सहारा मीडियाकर्मियों से मुलाकात करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।

विभव पाठक/ब्यूरो चीफ

निष्पक्ष जन अवलोकन 

गोरखपुर।

जो कलम वर्षों तक सत्ता, व्यवस्था और समाज की आवाज़ बनकर अन्याय के विरुद्ध खड़ी रही, आज वही कलम अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। सहारा मीडिया समूह से जुड़े सैकड़ों पत्रकार और कर्मचारी पिछले एक दशक से भी अधिक समय से गंभीर वेतन संकट का सामना कर रहे हैं। वर्ष 2013 से शुरू हुई यह आर्थिक पीड़ा आज तक थमी नहीं है। हालात ऐसे रहे हैं कि शायद ही कोई वर्ष ऐसा बीता हो, जब कर्मचारियों को पाँच–छह महीने से अधिक का वेतन नियमित रूप से प्राप्त हुआ हो।

लगातार आर्थिक अभाव, पारिवारिक जिम्मेदारियों और अनिश्चित भविष्य के बावजूद सहारा के पत्रकारों ने अपने पेशे से समझौता नहीं किया। सीमित संसाधनों और असहनीय दबाव के बीच भी उन्होंने जनहित की पत्रकारिता को जीवित रखा और समाज की आवाज़ को सत्ता के गलियारों तक पहुँचाने का कार्य किया। लेकिन अब यह संघर्ष अपनी सीमा पर पहुँचता दिख रहा है।

बीते सप्ताह सहारा प्रबंधन समिति द्वारा आर्थिक संकट का हवाला देते हुए प्रिंटिंग कार्य बंद करने का निर्णय लिया गया। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं था, जिन्होंने वर्षों तक संस्थान को अपनी मेहनत, निष्ठा और ईमानदारी से सींचा। एक झटके में सैकड़ों परिवारों के सामने रोज़ी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया। जो पत्रकार अब तक दूसरों के दुख-दर्द को शब्द देते रहे, वे आज स्वयं असहाय स्थिति में खड़े नजर आए।

इस कठिन समय में सहारा मीडियाकर्मियों ने गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर अपनी पीड़ा और समस्याओं को उनके समक्ष रखा। मीडियाकर्मियों ने बकाया वेतन, सेवा सुरक्षा और भविष्य की अनिश्चितता से जुड़ी तमाम बातों को विस्तार से अवगत कराया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरी संवेदनशीलता और गंभीरता के साथ पत्रकारों की बात सुनी। उन्होंने मीडियाकर्मियों को आश्वस्त किया कि उनके साथ न्याय होगा और समस्या के समाधान के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। मुख्यमंत्री के इस आश्वासन ने लंबे समय से निराशा के अंधेरे में जी रहे पत्रकारों के मन में उम्मीद की एक नई किरण जगा दी।

मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से सहारा मीडियाकर्मियों में यह विश्वास और मजबूत हुआ है कि उनकी वर्षों की सेवा, संघर्ष और त्याग व्यर्थ नहीं जाएगा। यह संघर्ष केवल बकाया वेतन की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कलम के सम्मान, पत्रकारों की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तथा लोकतंत्र की आत्मा को बचाए रखने की लड़ाई है।

आज जब मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारों की स्थिति पर सवाल खड़े हो रहे हैं, ऐसे समय में सहारा मीडियाकर्मियों की यह लड़ाई पूरे समाज के लिए एक संदेश है। यह याद दिलाती है कि यदि कलम कमजोर होगी, तो लोकतंत्र भी कमजोर पड़ेगा। मुख्यमंत्री का आश्वासन न सिर्फ सहारा परिवार के लिए, बल्कि संपूर्ण पत्रकारिता जगत के लिए उम्मीद का संदेश बनकर सामने आया है।