ग्राम पंचायतों में फर्जी मनरेगा का खेल उजागर, लालपुर भवनडीह से लेकर गौरा भारी तक कागज़ों में दौड़ रहे मजदूर

ग्राम पंचायतों में फर्जी मनरेगा का खेल उजागर, लालपुर भवनडीह से लेकर गौरा भारी तक कागज़ों में दौड़ रहे मजदूर

विकासखंड पचपेड़वा (बलरामपुर)में मनरेगा योजना गरीब मजदूरों के लिए रोजगार का साधन बनने के बजाय भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े का अड्डा बनती नजर आ रही है। एक के बाद एक ग्राम पंचायतों में “फोटो से फोटो” लेकर ऑनलाइन हाजिरी भरने और सरकारी धन के बंदरबांट का गंभीर आरोप सामने आया है। ग्राम पंचायत लालपुर भवनडीह में मनरेगा के तहत 5 मास्टर रोल पर 39 मजदूरों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज पाई गई, लेकिन जब मीडिया की टीम कार्यस्थल पर पहुंची तो न तो एक भी मजदूर मिला, न ही कुदाल, फावड़ा, नोट, टोकरी जैसी कोई सामग्री नजर आई। ग्रामीणों ने बताया कि केवल फोटो खींचकर फोटो से फोटो जोड़कर फर्जी काम दिखाया जा रहा है। इससे पहले भी निष्पक्ष जन अवलोकन ने यहां खबर प्रकाशित की थी, लेकिन अधिकारियों पर कोई असर नहीं पड़ा। उल्टा प्रधान के गुर्गों द्वारा फोन पर यह कहकर दबाव बनाया गया कि “खबर छपने से कुछ फर्क नहीं पड़ेगा, संबंधित अधिकारी हमारे साथ हैं।” इससे प्रशासनिक मिलीभगत की आशंका और गहरी हो जाती है। इसी तरह ग्राम पंचायत गौरी भारी में भी फर्जी मनरेगा को लेकर खबर प्रकाशित होने के बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं। कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जा रही है। कार्यस्थलों पर न मजदूर मिलते हैं, न ही काम से जुड़ी कोई सामग्री। तीसरे मामले में ग्राम पंचायत मदरहवा कलां में 4 मास्टर रोल पर 40 मजदूरों की ऑनलाइन हाजिरी दर्ज थी, जबकि मीडिया टीम के पहुंचने पर मात्र 5 मजदूर ही मौके पर मौजूद मिले। शेष मजदूर सिर्फ फोटो में ही दिखाई दे रहे हैं। चौथे मामले में ग्राम पंचायत बिशनपुर विश्राम में सचिव संजय मिश्रा द्वारा पत्रकारों को फोन पर धमकाने का आरोप है। यहां 3 मास्टर रोल पर 22 मजदूरों की ऑनलाइन हाजिरी भरी गई, जबकि कार्यस्थल पर मजदूर नदारद पाए गए। जब संवाददाता ने इस पूरे मामले पर बीडीओ मोहित दुबे से दूरभाष पर संपर्क किया तो उन्होंने जिम्मेदारी एपीओ पर डालते हुए पल्ला झाड़ लिया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या विकासखंड स्तर पर मनरेगा की निगरानी की कोई जिम्मेदारी बीडीओ की नहीं है? गौरतलब है कि इससे पहले भी पचपेड़वा विकासखंड में फर्जी मनरेगा भुगतान का खुलासा हो चुका है, जिसमें सचिव, प्रधान और जेई पर कार्रवाई होकर कुछ लोग जेल भी जा चुके हैं। बावजूद इसके जिले के आला अधिकारियों द्वारा ठोस कार्रवाई न होने से गरीब मजदूरों के हक पर लगातार डाका डाला जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस खुली लूट पर लगाम लगाएगा या मनरेगा का पैसा यूं ही कागजों और फोटो में उड़ता रहेगा।