एक सरकारी कंबल की कीमत… बुजुर्ग को ठंड में मिला तंत्र का ठंडा जवाब
निष्पक्ष जन अवलोकन
धीरेन्द्र कुमार
रायबरेली।
सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत एक बार फिर सदर तहसील में उजागर हुई है, जहां ठंड से कांप रहे एक बुजुर्ग को महीनों तक केवल दफ्तरों के चक्कर ही नसीब हुए, लेकिन सरकारी कंबल नहीं।
मामला नवंबर 2025 का है, जब एक बुजुर्ग ने जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र देकर कंबल की मांग की। डीएम महोदया ने संवेदनशीलता दिखाते हुए पत्र तत्काल सदर तहसीलदार को अग्रसारित कर दिया। इसके बाद शुरू हुआ फाइलों, दफ्तरों और जिम्मेदारियों का अंतहीन खेल।
तहसीलदार के निर्देश पर बुजुर्ग आरके कार्यालय पहुंचा, जहां जवाब मिला— “जब कंबल आएंगे तब आना।”
ठंड बढ़ती गई और बुजुर्ग सदर तहसील के चक्कर काटता रहा। कभी तहसीलदार मीटिंग में रहीं, तो कभी उनके कक्ष के बाहर तैनात कर्मचारियों ने “बाद में आने” की सलाह देकर लौटा दिया।
हैरानी की बात यह है कि तहसील में करीब 1300 कंबल डंप होने की जानकारी सामने आ रही है। इसके बावजूद जरूरतमंद को कंबल न मिलना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कानूनगो जितेंद्र सिंह चौहान ने बुजुर्ग को बताया कि “कंबल जिस अधिकारी के अधीन हैं, वे अपने हिसाब से वितरण करते हैं।”
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि एक लेखपाल ने सरकारी कंबल न दे पाने की पीड़ा को अपनी जेब से नकद पैसे देकर दूर करने का प्रयास किया, जबकि सरकारी कंबल गोदाम में पड़े रहे। यह स्थिति जहां व्यक्तिगत संवेदना दिखाती है, वहीं सरकारी तंत्र की असंवेदनशीलता को भी उजागर करती है।
सरकारी खर्च पर बिजली और हीटर की गर्माहट में बैठे अधिकारियों को शायद एक कंबल की अहमियत का अंदाजा नहीं। चर्चा तो यहां तक है कि पिछले वर्षों में सड़ चुके कंबलों को दफन तक कर दिया गया था, जिन्हें यदि खुदाई कराई जाए तो उनकी कहानी फिर सामने आ सकती है।
हालांकि इस मामले में एसडीएम सदर/ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रफुल्ल कुमार शर्मा को एक संवेदनशील अधिकारी के रूप में देखा जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि वे इस प्रकरण में हस्तक्षेप कर जिम्मेदार अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगेंगे और इसकी जानकारी मीडिया को भी देंगे।
अंततः प्रशासनिक उदासीनता के बीच बुजुर्ग को गैर-सरकारी स्तर पर कंबल की व्यवस्था कराई गई, लेकिन सवाल अब भी कायम है—
जब सरकारी कंबल मौजूद थे, तो जरूरतमंद तक क्यों नहीं पहुंचे?