महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भर गांवों का सपना देखा था, गांधी के आदर्श और मनरेगा की हकीकत के बीच बड़ा अंतर

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम योजना का उद्देश्य ग्रामीणों को 125 दिन का रोजगार देना है। लेकिन जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार और भुगतान में देरी की शिकायतें सामने आती हैं।

महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भर गांवों का सपना देखा था,  गांधी के आदर्श और मनरेगा की हकीकत के बीच बड़ा अंतर

निष्पक्ष जन अवलोकन । बदरुजमा चौधरी। 

विकासखंड तुलसीपुर (बलरामपुर)अंतर्गत ग्राम पंचायत सुदर्शन जोत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत चल रहे कार्यों में गंभीर अनियमितताओं का मामला सामने आया है। यहां कार्यस्थल से फोटो लेकर ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड किए जा रहे हैं, जबकि मौके पर मजदूरों की वास्तविक उपस्थिति संदिग्ध बताई जा रही है। जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत में 5 मास्टर रोल पर करीब 40 मजदूरों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज की गई है। लेकिन जब मीडिया टीम ने कार्यस्थल का निरीक्षण किया तो अधिकांश मजदूर वहां मौजूद नहीं मिले। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना कार्य कराए ही हाजिरी भरकर सरकारी धन निकासी की तैयारी की जा रही है। मीडिया टीम द्वारा दूरभाष पर संपर्क करने पर ग्राम प्रधान ने कहा कि “हमारा काम इसी तरह चलेगा, जो हमें ब्लॉक से बताया गया है, उसी तरह काम करेंगे।” प्रधान के इस बयान से मामले ने और तूल पकड़ लिया है। सवाल उठ रहा है कि यदि ब्लॉक स्तर से इस प्रकार के निर्देश दिए गए हैं तो क्या उच्च अधिकारी भी इस प्रक्रिया से अवगत हैं? ग्रामीणों का कहना है कि मनरेगा का उद्देश्य जरूरतमंद मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराना है, लेकिन यहां कागजों में रोजगार दिखाकर नियमों की अनदेखी की जा रही है। यदि जांच में अनियमितता साबित होती है तो यह न केवल सरकारी धन की बर्बादी होगी, बल्कि गरीब मजदूरों के अधिकारों पर भी सीधा प्रहार माना जाएगा। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। ग्रामीणों ने उच्चाधिकारियों से निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है, ताकि मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे।