गैसड़ी विकासखंड, जनपद बलरामपुर में मनरेगा की जमीनी हकीकत: कागज़ों में दौड़ते काम, मैदान में सन्नाटा
निष्पक्ष जन अवलोकन। विकासखंड: गैसड़ी (बलरामपुर) गैसड़ी विकासखंड के कई ग्राम पंचायतों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और फर्जीवाड़े की गंभीर शिकायतें सामने आई हैं। सूत्रों, ग्रामीणों और मौके पर पहुंची मीडिया टीम के निष्पक्ष जन अवलोकन के आधार पर जो तस्वीर उभरकर सामने आई है, वह चिंताजनक ही नहीं, बल्कि ग्रामीण आजीविका की नींव को हिलाने वाली है। ग्रामीणों का आरोप है कि यहां ऑनलाइन अटेंडेंस, फर्जी मास्टर रोल, पुराने फोटो अपलोड कर भुगतान निकालना और बिना कार्यस्थल के काम दिखाना आम बात हो चुकी है। संबंधित अधिकारियों—बीडीओ, सचिव, प्रधान और रोजगार सेवक—की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। 1. ग्राम पंचायत तुरकौलिया: 6 मास्टर रोल, 56 मजदूर… पर काम नदारद सूत्रों के अनुसार ग्राम पंचायत तुरकौलिया में 6 मास्टर रोल पर 56 मजदूरों की ऑनलाइन अटेंडेंस दर्ज की गई। कागजों में काम तेजी से चलता दिखाया गया, लेकिन जब मीडिया टीम कार्यस्थल पर पहुंची तो स्थिति चौंकाने वाली थी। न खुदरा (मिट्टी), न टोकरी, न फावड़ा, न मजदूरों की कोई गतिविधि। ग्रामीणों का कहना है कि “सिर्फ फोटो लेकर औपचारिकता पूरी की जाती है। काम कहीं दिखाई नहीं देता, लेकिन भुगतान निकल जाता है।” यह सवाल उठता है कि यदि 56 मजदूरों की उपस्थिति दर्ज है तो मैदान खाली क्यों है? क्या यह सिर्फ डिजिटल हाजिरी का खेल है? 2. ग्राम पंचायत सेमरी: 7 मास्टर रोल, 68 ऑनलाइन अटेंडेंस ग्राम पंचायत सेमरी में 7 मास्टर रोल पर 68 मजदूरों की ऑनलाइन अटेंडेंस दर्ज की गई। लेकिन यहां भी तस्वीर मिलती-जुलती रही। ग्रामीणों के मुताबिक: “फोटो से फोटो लेकर काम दिखाया जा रहा है। असली काम बहुत कम है, लेकिन ऑनलाइन पूरा दिखाया जाता है।” कार्यस्थल पर सीमित गतिविधि दिखाई दी, जबकि रिकॉर्ड में व्यापक काम दर्शाया गया। इससे साफ है कि तकनीक का उपयोग पारदर्शिता के लिए नहीं, बल्कि कागजी मजबूती के लिए हो रहा है। 3. ग्राम पंचायत मनकौरा काशीराम: 4 मास्टर रोल, 29 मजदूर… फोटो लेकर छोड़ दिया जाता है मनकौरा काशीराम में 4 मास्टर रोल पर 29 मजदूरों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज की गई। ग्रामीणों ने खुलकर आरोप लगाए: “हमें बुलाया जाता है।” “फोटो लिया जाता है।” “फिर काम बंद कर दिया जाता है।” “पुरानी जगहों की फोटो बार-बार अपलोड की जा रही है।” ग्रामीणों के अनुसार, असली काम कम और फोटो आधारित प्रबंधन ज्यादा है। मजदूरों का कहना है कि उन्हें पूरा रोजगार नहीं मिल रहा, लेकिन रिकॉर्ड में सब कुछ नियमित दिखाया जा रहा है। 4. ग्राम पंचायत लक्ष्मी नगर निश्चली: खबरें छपीं, कार्रवाई नहीं लक्ष्मी नगर निश्चली में स्थिति और गंभीर बताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर कई बार खबरें प्रकाशित होने के बावजूद कथित तौर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों के आरोप: पुराने फोटो अपलोड कर भुगतान निकाला जा रहा है संबंधित अधिकारी—बीडीओ, सचिव, प्रधान और रोजगार सेवक—की मिलीभगत सामुदायिक शौचालय बंद पड़े पंचायत भवन पर ताला प्रमाण पत्र (आय, जाति आदि) बनवाने के लिए ग्रामीणों को बाहर निजी खर्च करना पड़ता है एक ग्रामीण ने दर्द भरे स्वर में कहा: “मनरेगा का काम भी कागजों में, पंचायत भी कागजों में, और शौचालय भी कागजों में। ज़मीन पर हमें सिर्फ परेशानी मिलती है।” 5. ग्राम पंचायत वीरपुर कला: 11 मास्टर रोल, 101 मजदूर… पर मौके पर गिने-चुने लोग वीरपुर कला में 11 मास्टर रोल पर 101 मजदूरों की ऑनलाइन अटेंडेंस दर्ज है। लेकिन मीडिया टीम को कार्यस्थल पर गिने-चुने मजदूर ही मिले। ग्रामीणों का आरोप: काम ठेकेदारों के माध्यम से कराया जा रहा है मनरेगा में ठेकेदारी प्रतिबंधित है स्थानीय मजदूरों को पूरा काम नहीं मिल रहा ग्रामीण पलायन को मजबूर हैं यह विरोधाभास चौंकाने वाला है—कागजों में 101 मजदूर, जमीन पर कुछ ही लोग। आखिर बाकी मजदूर कहां हैं? 6. ग्राम पंचायत गणेशपुर: 7 मास्टर रोल, 61 मजदूर… मैदान में एक भी नहीं गणेशपुर में 7 मास्टर रोल पर 61 मजदूरों की ऑनलाइन अटेंडेंस दर्ज है। लेकिन जब मीडिया टीम पहुंची तो कार्यस्थल पर एक भी मजदूर नजर नहीं आया। संबंधित अधिकारी से दूरभाष पर संपर्क करने पर जवाब मिला: “कार्यस्थल का फोटो भेज दीजिए, मौका मिलेगा तो जांच करवा लेंगे।” यह प्रतिक्रिया स्वयं में कई सवाल खड़े करती है। यदि ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज है तो मौके पर मजदूर क्यों नहीं? क्या निगरानी तंत्र सिर्फ कागजों तक सीमित है? बड़ा सवाल: क्या मनरेगा बना ‘डिजिटल फर्जीवाड़े’ का माध्यम? इन सभी पंचायतों में एक पैटर्न साफ दिखाई देता है: कई मास्टर रोल बड़ी संख्या में ऑनलाइन अटेंडेंस पुराने फोटो अपलोड मौके पर सीमित या शून्य कार्य ग्रामीणों की शिकायत अधिकारियों की निष्क्रियता ग्रामीणों का आरोप है कि बड़े पैमाने पर भुगतान निकालने के लिए डिजिटल सिस्टम का दुरुपयोग किया जा रहा है। यदि यह सच है, तो यह न केवल सरकारी धन की बर्बादी है बल्कि गरीब मजदूरों के अधिकारों पर सीधा प्रहार है। सामुदायिक सुविधाओं की बदहाली मनरेगा के साथ-साथ अन्य पंचायत सुविधाओं की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई: सामुदायिक शौचालय बंद पंचायत भवन बंद ग्रामीणों को प्रमाण पत्र बनवाने के लिए निजी खर्च ऑनलाइन सेवाओं के नाम पर जेब से भुगतान यह तस्वीर सिर्फ आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता की कहानी भी कहती है। तड़पता बलरामपुर: मजदूरों का दर्द मनरेगा का उद्देश्य था— गांव में रोजगार पलायन पर रोक ग्रामीण विकास लेकिन जब मजदूरों को सिर्फ फोटो तक सीमित कर दिया जाए, जब हाजिरी डिजिटल और पेट खाली हो, तब योजना का उद्देश्य सवालों के घेरे में आ जाता है। एक बुजुर्ग मजदूर की बात दिल को छू जाती है: “नाम से हम मजदूर हैं, कागज में हम काम कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में हमें काम नहीं मिल रहा।” मांग: निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों की मांग है: सभी संबंधित ग्राम पंचायतों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच मास्टर रोल और भुगतान का ऑडिट जियो-टैग फोटो की तकनीकी जांच दोषियों पर कठोर कार्रवाई मजदूरों को वास्तविक रोजगार की गारंटी यदि समय रहते जांच नहीं हुई, तो यह मामला बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार की कहानी बन सकता है। निष्कर्ष गैसड़ी विकासखंड के इन ग्राम पंचायतों की तस्वीर यह संकेत देती है कि कहीं न कहीं सिस्टम में गंभीर खामियां हैं। कागजों और पोर्टल पर विकास की रफ्तार तेज है, लेकिन जमीन पर सन्नाटा पसरा है।