भुजपुर ग्राम पंचायत में मनरेगा फर्जीवाड़ा, 50 मजदूरों की हाजिरी ऑनलाइन दर्ज – मौके पर नहीं मिला श्रमिक

भुजपुर ग्राम पंचायत में मनरेगा फर्जीवाड़ा, 50 मजदूरों की हाजिरी ऑनलाइन दर्ज – मौके पर नहीं मिला श्रमिक

निष्पक्ष जन अवलोकन। जनपद बलरामपुर विकासखंड पचपेड़वा अंतर्गत ग्राम पंचायत भुजपुर में मनरेगा कार्यों में भारी गड़बड़ी और फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यहां 5 मास्टर रोल पर लगभग 50 मजदूरों की ऑनलाइन हाजिरी दर्ज की जा रही है, जबकि मौके पर काम करने वाले मजदूरों की संख्या बेहद कम पाई गई। गांव के लोगों का कहना है कि यहां अधिकांश समय पर फोटो से फोटो लेकर हाजिरी भर दी जाती है, जबकि वास्तविक मजदूरों को न तो काम मिलता है और न ही उनकी मेहनत की सही मजदूरी। गरीब मजदूरों के हिस्से की रोज़ी–रोटी पर इस तरह से डाका डाला जा रहा है। कई मजदूरों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि जब वे काम मांगते हैं तो उन्हें टाल दिया जाता है, लेकिन उनके नाम पर हाजिरी लगाकर भुगतान निकल लिया जाता है। ग्राम पंचायत में किए जा रहे कार्यों की हकीकत जानने के लिए जब संवाददाता मौके पर पहुंचे तो मजदूरों की भीड़ देखने को नहीं मिली। केवल कुछेक लोग काम करते पाए गए। वहीं, मनरेगा पोर्टल पर डाली गई ऑनलाइन अटेंडेंस में 50 मजदूरों की उपस्थिति दर्ज है। यह साफ इशारा करता है कि पूरे खेल में मिलीभगत है। इस मामले में संबंधित अधिकारी से दूरभाष पर संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन फोन कॉल रिसीव नहीं किया गया। इससे यह और भी स्पष्ट हो गया कि अधिकारियों को इस फर्जीवाड़े की जानकारी है, मगर जिम्मेदारी से बचने के लिए चुप्पी साधी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि मनरेगा योजना का उद्देश्य गरीब परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराना है, लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। जिन लोगों को दिहाड़ी मिलनी चाहिए थी, उनकी जगह फर्जी तरीके से हाजिरी लगाकर भुगतान निकाला जा रहा है। इससे न केवल मजदूरों का हक मारा जा रहा है, बल्कि सरकार की छवि भी धूमिल हो रही है। जनपद प्रशासन को चाहिए कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। क्योंकि अगर ऐसे फर्जीवाड़ों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो गरीब मजदूरों के हक पर लगातार डाका पड़ता रहेगा और मनरेगा योजना का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। यह खबर न सिर्फ भुजपुर ग्राम पंचायत की हकीकत उजागर करती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि आखिर कब तक मजदूरों के खून–पसीने से खेला जाएगा और कब उन्हें उनका हक मिलेगा।