पचपेड़वा विकासखंड से बड़ी खबर पंचायत विकास में भ्रष्टाचार का काला खेल जिम्मेदारों की मिलीभगत उजागर

निष्पक्ष जन अवलोकन। जनपद बलरामपुर के विकासखंड पचपेड़वा की ग्राम पंचायत नवाडीह में भ्रष्टाचार और लापरवाही का ऐसा खेल सामने आया है, जिसने पूरे तंत्र की पोल खोल दी है। दो महीने से लगातार उठ रही ग्रामीणों की आवाज और मीडिया की रिपोर्टें इस बात का सबूत हैं कि यहां विकास के नाम पर सिर्फ लूट-खसोट हो रही है। 21 जून से लेकर अब तक तीन बार प्रमुखता से खबरें प्रकाशित हुईं, मगर खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) पचपेड़वा मोहित दुबे का हर बार वही रटा-रटाया जवाब आया जांच कराएंगे सवाल यह है कि आखिर जांच कब पूरी होगी और क्यों टाली जा रही है क्या वाकई यह भ्रष्टाचार बीडीओ की मिलीभगत से ही फल-फूल रहा है? पंचायत की शर्मनाक तस्वीर ग्राम पंचायत नवाडीह, जिसे कभी विकास का मॉडल बनाने का सपना दिखाया गया था, आज बदहाली और अव्यवस्था की जीती-जागती मिसाल बन चुकी है। पंचायत का सामुदायिक शौचालय महीनों से बंद पड़ा है। ग्रामीणों को सुविधा देने के बजाय यहां ताला झूल रहा है। करोड़ों रुपये की योजनाओं का पैसा कागजों पर खर्च दिखा दिया गया, लेकिन जमीन पर नतीजा शून्य है। पंचायत भवन की हालत और भी भयावह है। भवन की दीवारें टूटी हुईं, छत टपक रही है और कार्यालय के नाम पर खंडहर जैसा मंजर दिखता है। जिस भवन में विकास की योजनाओं की रूपरेखा बननी थी, वहां अब सिर्फ भ्रष्टाचार की बदबू आती है। सफाई पर भी ‘सफाई’ गांव की गलियों में सफाई का नामोनिशान नहीं है। नालियां जाम पड़ी हैं, कूड़ा-कचरा जगह-जगह सड़ रहा है। नियमित सफाई कर्मियों की तैनाती के बावजूद हालात जस के तस हैं। यह न केवल लापरवाही बल्कि पूरे सिस्टम की मिलीभगत का नतीजा है। साफ है कि सफाई कर्मियों के वेतन का पैसा कागजों में दर्ज है, मगर गांव की गलियां गंदगी से भरी हैं। ग्रामीणों का आरोप गांव के लोगों का सीधा आरोप है कि पंचायत में आई विकास की धनराशि को कागजी खेल और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया गया। ग्रामीणों ने कई बार शिकायत दर्ज कराई, लेकिन बीडीओ मोहित दुबे हर बार केवल आश्वासन देकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का तरीका है। बीडीओ की चुप्पी सबसे बड़ा सबूत सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जब बीडीओ मोहित दुबे से इस विषय पर बात करने के लिए फोन किया गया तो उन्होंने कॉल रिसीव करना ही बंद कर दिया। उल्टा ब्लॉक बुलाने का मैसेज भेजकर पल्ला झाड़ लिया। यह रवैया बताता है कि कहीं न कहीं अधिकारी खुद इस खेल में शामिल हैं या फिर जिम्मेदारों को बचाने में लगे हुए हैं। सिर्फ नवाडीह ही क्यों? यह भ्रष्टाचार का खेल सिर्फ नवाडीह पंचायत तक सीमित नहीं है। विकासखंड पचपेड़वा के भथार ग्राम पंचायत में आवास योजना का पैसा गड़प किया गया, बिशनपुर टनटनवा के साथ विकासखंड के अन्य कई ग्राम पंचायत से यह मामला प्रकाश में लगातार आता रहा है पंचायत में भी भ्रष्टाचार की कहानियां उजागर हो चुकी हैं। यानी पूरा ब्लॉक विकास की जगह भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुका है। सोशल मीडिया पर गूंज आज का ग्रामीण अब चुप नहीं बैठ रहा। सोशल मीडिया और स्थानीय मंचों पर लोग खुलकर सवाल उठा रहे हैं। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि अगर सामुदायिक शौचालय बंद ही रखना था तो लाखों रुपये क्यों उड़ाए गए? अगर पंचायत भवन खंडहर ही बनना था तो मरम्मत के नाम पर झूठी फाइल क्यों तैयार की गई? आखिरकार विकास का पैसा ग्रामवासियों की जिंदगी बदलने के बजाय भ्रष्टाचार की बलि क्यों चढ़ रहा है? पंचायती व्यवस्था पर सवाल नवाडीह पंचायत का मामला सिर्फ एक पंचायत की बदहाली नहीं बल्कि पूरे तंत्र की असफलता का आईना है। जब बार-बार शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं होती, तो सवाल उठता है कि ग्राम पंचायतों में बहने वाला करोड़ों का पैसा आखिर किस जेब में जा रहा है? अगर यही हाल रहा तो ग्रामीणों का भरोसा पंचायती व्यवस्था से पूरी तरह उठ जाएगा। आंदोलन की आहट ग्रामीण अब चेतावनी के मूड में हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते उच्चाधिकारियों ने हस्तक्षेप नहीं किया और बीडीओ मोहित दुबे समेत पूरे तंत्र की निष्पक्ष जांच नहीं कराई, तो यह मामला बड़ा जन आंदोलन का रूप ले सकता है। लोगों का गुस्सा अब उबाल पर है और प्रशासन की चुप्पी इसे और भड़काने का काम कर रही है। निष्कर्ष पचपेड़वा ब्लॉक की नवाडीह पंचायत विकास की जगह भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी है। यहां न तो योजनाएं धरातल पर उतरती हैं और न ही अधिकारियों को कोई जवाबदेही निभानी है। बीडीओ की चुप्पी और बार-बार दिए जाने वाले खोखले आश्वासन ही इस खेल की सबसे बड़ी गवाही हैं। अगर उच्च स्तर से तत्काल जांच और कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ एक पंचायत की नहीं बल्कि पूरे तंत्र की साख को बर्बाद कर देगा। सच यही है कि नवाडीह पंचायत की कहानी इस बात का सबूत है कि जब अधिकारी ही मिलीभगत में हों तो भ्रष्टाचार रोकना असंभव हो जाता है।