तीर्थंकर संभवनाथ के जन्म से पूर्व छह माह तक हुई थी रत्नों की वर्षा:-प्रशांत जैन

निष्पक्ष जन अवलोकन

तीर्थंकर संभवनाथ के जन्म से पूर्व छह माह तक हुई थी रत्नों की वर्षा:-प्रशांत जैन

निष्पक्ष जन अवलोकन। प्रशांत जैन। बिल्सी(बदायूँ):- बिसौली बिल्सी रोड स्थित श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन अतिशय तीर्थ क्षेत्र पद्मांचल जैन मंदिर पर आज जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक धूमधाम के साथ मनाया गया यहां सर्वप्रथम जैन अनुवाइयों द्वारा भगवान जिनेंद्र स्वामी का मंगल जलाभिषेक कर शांति धारा की गई श्री दिगंबर जैन महासमिति के मंडलाध्यक्ष प्रशांत कुमार जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि मान्यता है कि भगवान संभवनाथ के जन्म होने के पूर्व निरंतर छह माह तक श्रावस्ती में रत्न वर्षा हुई थी। भगवान संभवनाथ के पिता का नाम जितारि और माता का नाम शुसेना था। पद्मम पुराण, बरांग चरित व उत्तम पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि संभव कुमार ने अपना बाल्यकाल और युवावस्था श्रावस्ती में ही बिताया था। उन्होंने राज और सांसारिक भोगो का भी उपयोग किया, लेकिन एक दिन जब वह महल की छत पर बैठे प्राकृतिक छंटा निहार रहे थे तो सहसा हवा के झोंके बदलों के टुकड़े गगन में विलीन हो गए जिससे वह बिचलित हो उठे। राजकाज के मोह के बंधन ढीले पड़ गए। संसार की असारता का विचार आते ही उनमें वैराग्य पैदा हो गया। मगसिर शुक्ला पूर्णमासी को श्रावस्ती के सहेतुक वन में उन्होंने दीक्षा ले ली। जैन शास्त्रों के अनुसार भगवान संभव नाथ ने मार्ग शीर्ष शुक्ल पूर्णिमा के दिन सहेतुक वन के घनघोर जंगल में वस्त्राभूषण का त्याग कर दिया और पंचमुखी केस लौट कर उपवास का नियम ले लय में निमग्न हो गए। 14 वर्षो तक भगवान संभवनाथ ने घोर तप किया। कार्तिक सुदी चतुर्दशी को जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ तब देवो और मनुष्यों ने श्रावस्ती सहेतुक वन में बड़े उल्लास के साथ ज्ञान कल्याण का पूजन किया। इस अवसर पर समाज के अध्यक्ष मृगांक कुमार जैन उर्फ टीटू,अरविंद जैन,ज्योति जैन ,अभिषेक जैन ,शालिनी जैन,प्रियांश जैन आदि मौजूद रहे