गोरखपुर: अस्पताल के बेसमेंट में हेल्थकेयर एकेडमी पर सवाल, पत्रकारों को धमकी देने के आरोप
गोरखपुर के एक निजी अस्पताल के बेसमेंट में पार्किंग स्थल पर हेल्थकेयर एकेडमी संचालित होने के दावे को लेकर विवाद गहराया। दस्तावेजों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर सवाल उठे। खबर प्रकाशित करने वाले पत्रकारों ने धमकी भरे फोन आने का आरोप लगाया।
विभव पाठक/ब्यूरो चीफ
गोरखपुर। शहर के एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल के बेसमेंट में संचालित GD Goenka Healthcare Academy को लेकर उठे सवाल अब केवल भवन मानकों तक सीमित नहीं रह गए हैं। मामला अब प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों पर कथित दबाव बनाने के आरोपों तक पहुंच गया है।
उपलब्ध दस्तावेजों, फोटो और वीडियो के आधार पर दावा किया जा रहा है कि जिस बेसमेंट में हेल्थकेयर एकेडमी संचालित हो रही है, वह अस्पताल के स्वीकृत मानचित्र में पार्किंग के लिए निर्धारित है। मौके पर मौजूद तस्वीरों और वीडियो में बेसमेंट के प्रवेश द्वार पर स्पष्ट रूप से "PARKING" का संकेत दिखाई देता है, जबकि उसी परिसर में एकेडमी के बोर्ड, प्रचार सामग्री और शैक्षणिक गतिविधियों के संचालन के संकेत भी नजर आते हैं।
यदि वास्तव में पार्किंग के लिए स्वीकृत स्थान का उपयोग शैक्षणिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है, तो यह भवन उपविधियों, पार्किंग मानकों और अग्नि सुरक्षा नियमों के अनुपालन से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि पिछले लगभग एक वर्ष से यह गतिविधि संचालित होने के बावजूद संबंधित विभागों ने अब तक क्या कार्रवाई की? क्या गोरखपुर विकास प्राधिकरण (GDA), नगर निगम, अग्निशमन विभाग अथवा अन्य सक्षम अधिकारियों ने इस परिसर का निरीक्षण किया? यदि किया तो उसकी रिपोर्ट क्या कहती है और यदि नहीं किया तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
इसी बीच एक और गंभीर आरोप सामने आया है। इस मुद्दे को प्रमुखता से प्रकाशित करने वाले पत्रकारों का कहना है कि खबर प्रकाशित होने के बाद उन्हें लगातार धमकी भरे लहजे में फोन किए जा रहे हैं और आगे इस विषय पर समाचार प्रकाशित न करने का दबाव बनाया जा रहा है। यदि यह आरोप सही हैं, तो यह केवल एक भवन नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को डराने-धमकाने का भी गंभीर प्रश्न बन जाता है। किसी भी पत्रकार को तथ्यात्मक और जनहित से जुड़े मुद्दे उठाने से रोकने का प्रयास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
यह मामला किसी एक अस्पताल या संस्थान तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या शहर में भवन मानकों और नियमों का पालन सभी पर समान रूप से लागू होता है, या फिर प्रभावशाली संस्थानों के लिए अलग व्यवस्था है? यदि छोटे प्रतिष्ठानों पर नियमों के उल्लंघन पर तत्काल कार्रवाई होती है, तो बड़े संस्थानों के मामलों में भी समान मानक अपनाए जाने चाहिए।
अब आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित प्रशासनिक विभाग उपलब्ध दस्तावेजों, फोटो और वीडियो की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करें। साथ ही, यदि पत्रकारों को धमकाने के आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो उनकी भी स्वतंत्र जांच कर दोषियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। जनहित से जुड़े प्रश्नों का उत्तर दबाव से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और कानून के समान अनुपालन से दिया जाना चाहिए।









