“एम्स रायबरेली में इलाज या इंतज़ार? 6 साल की बच्ची को अल्ट्रासाउंड के लिए 2027 की तारीख—स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल”

“एम्स रायबरेली में इलाज या इंतज़ार? 6 साल की बच्ची को अल्ट्रासाउंड के लिए 2027 की तारीख—स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल”

निष्पक्ष जन अवलोकन 

पत्रकार धीरेन्द्र कुमार 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान रायबरेली में स्वास्थ्य सुविधाओं की हकीकत एक बार फिर सामने आई है, जहां बेहतर इलाज के दावे खोखले साबित होते दिख रहे हैं। ताजा मामला रायबरेली कोतवाली क्षेत्र के गोराबाजार निवासी  धीरेन्द्र कुमार की 6 वर्षीय बेटी से जुड़ा है, जो पेट दर्द से परेशान थी।

परिजनों ने उम्मीद के साथ बच्ची को एम्स रायबरेली ले जाकर दिखाया। डॉक्टर ने जांच के बाद अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी, लेकिन जब परिजन अल्ट्रासाउंड विभाग पहुंचे तो उन्हें जो तारीख दी गई, उसने सबको हैरान कर दिया। बच्ची के अल्ट्रासाउंड के लिए 3 नवंबर 2027 की तारीख थमा दी गई—यानी करीब डेढ़ साल बाद की।

पीड़ित पिता का कहना है कि जब उन्होंने इस पर आपत्ति जताई और बताया कि वर्तमान में 2026 चल रहा है, तो उनकी बात अनसुनी कर दी गई। बाद में डॉक्टर ने भी मजबूरी जताते हुए बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दे दी। इतना ही नहीं, अस्पताल के गार्ड द्वारा निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रों के नाम तक सुझाए गए।

यह घटना न सिर्फ अस्पताल की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि गरीब मरीजों की मजबूरी को भी उजागर करती है। एक ओर जहां सक्षम लोग निजी अस्पतालों में जांच करा सकते हैं, वहीं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।

मामला यहीं खत्म नहीं होता। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल परिसर में स्थित अमृत फार्मेसी और प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों पर भी डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं रहतीं, जिससे मरीजों को मजबूरी में बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।

इस पूरे मामले पर जब डॉ. नीरज श्रीवास्तव, प्रवक्ता एम्स रायबरेली से बात की गई तो उन्होंने स्टाफ की कमी को वजह बताया। उनका कहना है कि अस्पताल में केवल एक डॉक्टर है और कोई वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं है, जो मरीजों को देख भी सके और अल्ट्रासाउंड भी कर सके। इसी कारण यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

अब बड़ा सवाल यह है कि जब देश के प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थानों में ही मरीजों को समय पर जांच और दवाएं नहीं मिल पा रहीं, तो आम जनता आखिर भरोसा किस पर करे? क्या सरकार केवल दावे और उद्घाटन तक सीमित रह गई है, या जमीनी स्तर पर सुधार की भी कोई ठोस योजना है?

यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर करती है और जिम्मेदारों से जवाब मांगती है।