कहती है यह व्यव्स्था पुरुष ही प्रधान व प्रमुख सकरन सीतापुर।।

कहती है यह व्यव्स्था पुरुष ही प्रधान व प्रमुख सकरन सीतापुर।।

कहती है यह व्यव्स्था पुरुष ही प्रधान व प्रमुख सकरन सीतापुर।।

कहती है यह व्यवस्था पुरुष ही प्रधान व प्रमुख सकरन सीतापुर।।

सकरन ब्लॉक में 80 फीसदी से ज्यादा महिला प्रधानों के अधिकारों पर काबिज हैं उनके पति,ससुर,या बेटे प्रशासन और राजनीति में भी स्वीकार्यता।

सकरन /सीतापुर।

सीतापुर जिले की विकास खंड सकरन की 85 ग्राम पंचायतों में से 50 पंचायतों का नेतृत्व महिलाओं के हाथों में है।पुरुष प्रधानों की तुलना में यह आंकड़ा बहुत ज्यादा है।

लेकिन ग्राम पंचायतों का काम काज संभालने के लिहाज से देखा जाए तो महिला सशक्तिकरण के के लिहाज आशाविंत करने वाला बिलकुल भी नहीं है।महिला प्रधान वाली५० ग्राम पंचायतों में ऐसी एक ग्राम पंचायत भी ढूंढना असंभव है।जिसमे वास्तविक रूप से स्वयं काम काम कर रही हो।लगभग शत - प्रतिशत ग्राम पंचायतों में उनके पति, ससुर या बेटे ही प्रधानी संभाल रहे हैं।सकरन ब्लॉक में 35 पुरुष प्रधान है।और 50 महिलाएं हैं।इस तरह महिला प्रधानों की संख्या पुरुष प्रधानों से ज्यादा ही है।लेकिन अगर ग्राम पंचायतों के नेतृत्व के लिहाज से देखें तो इस कागजी आंकड़े के कोई मायने नहीं है।कुछ ग्राम पंचायतों में तय आरक्षण से भी कुछ आरक्षित महिलाओं को भी चुना जाना सिर्फ सियासी समीकरणों और मजबूरियों का खेल ही है।दुर्भाग्यवश यहां भी ग्राम पंचायतों में उनके अधिकारों पर पतियों का कब्जा कर लिए जाने को राजनैतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी भरपूर स्वीकार्यता मिली हुई है।

राजनैतिक कामों के लिए नेताओं और प्रशासनिक कामों के लिए अफसरों का संपर्क भी महिला प्रधानों से नहीं बल्कि उनके अधिकारों पर काबिज लोगों से ही रहता है। महिलाएं सिर्फ प्रधान जी कहलाने भर से खुश हैं।

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बस इतना सा काम जहां कहो वहां कर देती हैं हस्ताक्षर।

सरकारी कार्यक्रमों बैठकों गांव में होने वाले विकास के फैसलों में महिला प्रधानों की कोई भूमिका नहीं होती है।प्रधान बनने के बावजूद राजनीति में भी उन्हें कोई नही पूछता है।फैसले घर के पुरष ही लेते हैं।उन्हें बस कागजों पर हस्ताक्षर करने भर का काम करना होता है।खुली बैठकों से लेकर शासन प्रशासन की ओर से आयोजित कार्यक्रमों में भी उनके पति ससुर बेटे ही शामिल होते हैं। और कोई इसपर आपत्ति भी नहीं करता।

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उनके बोल।

प्रधान मैं हु या मेरी पत्नी फर्क क्या है।

निष्पक्ष जन अवलोकन की पड़ताल में जब संवाददाता सतीश सिंह परमार द्वारा लगभग दर्जन भर ग्राम पंचायतों में महिला प्रधानों से संपर्क करने की कोशिश की गई परंतु एक भी महिला प्रधान से बात करने में असफल रहे।पंचायत विभाग से हासिल हुए फोन नंबरों पर कॉल करने पर उनके अधिकारों को हड़पने वाले पतियों ने ही फोन रिसीव किया और सीधे सीधे कहा कि मैं बात करूं या मेरी पत्नी फर्क क्या है।

मामले को लेकर जब मनोज कुमार डीपीआरओ सीतापुर से वार्ता करने का प्रयास किया गया परंतु उनका फोन रिसीव नहीं हुआ।