परम पूज्य आचार्य श्री सतीश जी महाराज की कलम से

कानपुर निष्पक्ष जन अवलोकन नारायण शुक्ला

 

प्रत्येक मास की चतुर्थी को गणेश अथवा विनायक चतुर्थी कहते हैं, लेकिन भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की गणेश चतुर्थी का विशेष महत्व है। गणेश चतुर्थी विशेष रूप से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाती है। इस वर्ष 10 सितंबर को गणेश चतुर्थी गणेश महोत्सव के रूप में मनाई जाएगी। हिंदू समाज में मिट्टी के बने गणेश जी का आह्वान करके  उनकी प्रतिमा को लाते हैं और विधिवत घर में पूजा,आरती और भोग आदि की व्यवस्था करते हैं। गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश का आगमन या विराजमान करना और अनंत चतुर्दशी को गणेश का विसर्जन करने का महत्व है, किंतु कुछ लोग थोड़े समय के लिए ही गणेश जी अपने घरों में विराजमान करते हैं। इसमें से कुछ तीन, पांच तो कुछ सात दिन। गणेश जी विराजमान के लिए कुछ नियम हैं।  गणेश जी को संकल्पपूर्वक अपने घर में आने के लिए निमंत्रण दें। उन्हें श्रद्धाभाव से लेकर आएं। घर आने पर उनका फूलों से उनका स्वागत करें। विशेष स्थान पर उन्हें विराजमान करें। धूप, दीप, नैवेद्य एवं आरती से उनकी पूजा करें। उसके पश्चात प्रतिदिन सुबह-शाम की आरती, भोग, प्रसाद की व्यवस्था करें। जितने दिनों के लिए आप गणेश जी को लाए हैं उसके बाद उन्हें विशेष आयोजनों के द्वारा उन्हें नदी और तालाब आदि ने विसर्जित कर दें। घर से मंगल गान गाते हुए पुष्प वर्षा करते हुए भगवान को आदरपूर्वक विदा करें और अगले साल आने के लिए पुनः कहें।:

गणेश स्थापना के शुभ मुहूर्त

परम पूज्य आचार्य श्री सतीश जी महाराज ने बताया

इस वर्ष 10 सितंबर को अच्छा योग नहीं बन रहा है, किंतु 12:00 बजे के पश्चात चित्रा नक्षत्र में आप गणेश जी को अपने घरों में विराजित कर सकते हैं। क्योंकि यह प्रचलन भगवान को विराजित करने और विसर्जन करने का है इसलिए चर लग्न का मुहूर्त श्रेष्ठ माना है। घर में लक्ष्मी-गणेश तो पहले से ही स्थाई रूप से विराजित होते हैं। 10 सितंबर को चर लग्न (मकर लग्न ) शाम 15:34 बजे से 17:17 बजे तक रहेगा। उसके पश्चात शाम 20:10 से 21:46  बजे तक भी मेष लग्न (चर लग्न) है। उसमें भी आप इनकी स्थापना या विराजमान कर सकते हैं। घर में गणेश जी के विराजमान रहने तक सात्विक वातावरण, नियम और संयम का पालन अवश्य होना चाहिए।  नियमित रूप से भगवान जी के दर्शन, पूजन एवं आरतीकरते रहे । ओम् गं गणपतये नमः।ओम् विघ्नविनाशकाय नमः। ओम ऋद्धिसिद्धि पतये नमः। इन विशेष मंत्रों का जाप नियमित करते रहें। भगवान को मोदक अर्थात लड्डू प्रिय हैं। इसलिए रोजाना उनको मोदक का प्रसाद का भोग लगाएं। इस प्रकार किए गए गणपति विराजमान से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

 

भगवान गणेश को क्यों पसंद है ‘दूर्वा? जानिए इसका महत्व

 

मोदक और लड्डू का भोग तो भगवान गणेश जी को अति प्रिय है ही इसके अलावा गणेश जी को ‘दूर्वा’ चढ़ाने का भी काफी महत्व है। कहा जाता है कि गणेश पूजन में गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने से गणेश जी प्रसन्न होते हैं और भक्त को उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

आपको बता दें कि ‘दूर्वा’ एक प्रकार की घास है जिसे ‘दूब’ भी कहा जाता है, संस्कृत में इसे दूर्वा, अमृता, अनंता, गौरी, महौषधि, शतपर्वा, भार्गवी आदि नामों से जाना जाता है। ‘दूर्वा’ कई महत्वपूर्ण औषधीय गुणों से युक्त है। इसका वैज्ञानिक नाम साइनोडान डेक्टीलान है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय जब समुद्र से अमृत-कलश निकला तो देवताओं से इसे पाने के लिए दैत्यों ने खूब छीना-झपटी की जिससे अमृत की कुछ बूंदे पृथ्वी पर भी गिर गईं थी जिससे ही इस विशेष घास ‘दूर्वा’ की उत्पत्ति हुई।

 

गणेश जी को दूर्वा अत्याधिक प्रिय क्यों है इसके संबंध में पुराणों में एक कथा कही गई है जिसके अनुसार अनादि काल में अनलासुर नाम का एक विशाल दैत्य हुआ करता था जिसके कोप से धरती सहित स्वर्ग लोक में भी त्राही-त्राही मची हुई थे। समस्त देवता, ऋषि-मुनि, मानव इस दैत्य के आतंक से त्रस्त थे। यह दैत्य धरती पर मानवों को जिंदा ही निगल जाता था।

परम पूज्य आचार्य श्री सतीश जी महाराज ने बताया

 

इस विशालकाय दैत्य से तंग आकर एक बार देवराज इंद्र सहित समस्त देवता और ऋषि-मुनि महादेव शिवजी की शरण में पहुंचे और प्रार्थना की कि हमें इस दैत्य के आतंक से मुक्ति दिलाएं। महादेव ने कहा कि यह काम तो विध्नहर्ता गणेश ही कर सकते हैं, आपको उनकी शरण में जाना चाहिए। महादेव का आदेश पाकर सभी देवता और प्रमुख ऋषि-मुनि भगवान गणेश जी के पास पहुंचे और अनलासुर के कोप से मुक्ति दिलाने की विनती गणपति बप्पा से की।

 

देवताओं, ऋषि-मुनियों और धरती पर प्राणियों के संकट निवारण के लिए गणेश जी ने अनलासुर के साथ युद्ध करने का निश्चय किया। महा दैत्य अनलासुर से भयंकर युद्ध करते हुए गणेश जी ने अनलासुर को उसके किए की सजा कुछ ऐसे दी कि उसको ही निगल लिया। गणेश जी के पेट में जाने के बाद इस दैत्य के मुंह से तीव्र अग्नि निकली जिससे गणेश के पेट में बहुत जलन होने लगी। गणपति के पेट की जलन शांत करने के लिए कश्यप ऋषि ने गणेश जी को दूर्वा की 21 गांठें बनाकर खाने के लिए दी। ‘दूर्वा’ को खाते ही गणेश जी के पेट की जलन शांत हो गई और गणेश जी प्रसन्न हुए जिसके बाद सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों सहित समस्त धरती वासियों ने गणेश की खूब जय-जयकार की। कहा जाता है तभी से भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई।

 

गणेश पूजन में ‘इदं दुर्वादलं ऊं गं गणपतये नमः’ मंत्र बोलकर गणेश जी को दूर्वा अर्पित करें।