कानपुर निष्पक्ष जन अवलोकन नारायण शुक्ला

परम पूज्य आचार्य श्री सतीश जी महाराज की कलम से

हिंदी पंचांग के अनुसार हरतालिका तीज व्रत हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है. इस दिन महिलाएं भगवान शिव व माता पार्वती की रेत के द्वारा बनाई गई अस्थाई मूर्ति की पूजा करती हैं

हिंदू धर्म में हरतालिका तीज व्रत का विशेष महत्व है. यह व्रत हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है. इस दिन महिलाएं व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति, जो कि रेत की बनी होती है, की पूजा करती है. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर पूजा करने से वैवाहिक जीवन का सुख और संतान की प्राप्ति होती है. साल 2021 में हरतालिका तीज का व्रत 9 सितंबर सिन गुरुवार को रखा जाएगा.

 

 

ऐसे हुई हरतालिका तीज की उत्पत्ति

 

परम पूज्य आचार्य श्री सतीश जी महाराज ने बताया

 

एक पौराणिक कथा में हरतालिका तीज की उत्पत्ति व इसके नाम एवं महत्व का वर्णन किया गया है. हरतालिका शब्द, दो शब्दों-हरत व आलिका से मिलकर बना है. जिसमें हरत का अर्थ अपहरण और आलिका का अर्थ स्त्रीमित्र (सहेली) होता है. हरतालिका तीज की पौराणिक कथा के अनुसार, पार्वतीजी की सहेलियों ने पार्वती जी का अपहरण कर घने जंगल में लेकर चली गई थीं. ताकि पार्वतीजी की इच्छा के विरुद्ध उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से न कर दें.

 

परम पूज्य आचार्य श्री सतीश जी महाराज ने कहा

 

पूजा विधि: हरतालिका तीज पर व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि विधान से पूजा अर्चना करनी चाहिए. नियमानुसार हरतालिका तीज प्रदोषकाल में किया जाता है. सुबह उठकर स्नानादि के बाद भगवान शिव और माता पार्वती को साक्षी मानकर व्रत का संकल्प लें. दिन भर निर्जला व्रत रहें. सूर्यास्त के बाद के प्रदोषकाल में भगवान शिव और माता पार्वती की रेट से बनी मूर्ति को स्थापित कर पूजा करें. पूजा की दौरान सुहाग की सभी वस्तुओं को माता पार्वती को अर्पित करें. व्रत कथा सुनकर आरती करें.

परम पूज्य आचार्य श्री सतीश जी महाराज ने बताया

 

कैसे होती है पूजा:

 

हरतालिका पूजन प्रातः काल और प्रदोष बेला होती है. पूजन के लिए मिट्टी अथवा बालू से शिव पार्वती जी और गणेश जी की मूर्ति बनाई जाती है. फुलेरा बनाकर उसे सजाया जाता है. फिर रंगोली डालकर चौकी रखी जाती है. चौकी पर स्वास्तिक बनाकर थाली के साथ केले का पत्ता रखकर उसमें भगवान स्थापित किए जाते हैं. फिर कलश तैयार किया जाता है. सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है. कलश को जल से स्नान कराकर के रोली चंदन अक्षत चढ़ाया जाता है. फिर गणेश जी का पूजन किया जाता है. इसके बाद शिव और पार्वती जी का पूजन कर पार्वती जी का श्रृंगार किया जाता है. अगले दिन प्रातः काल पूजन करके पार्वती जी को सिंदूर अर्पित करके सिंदूर लगाया जाता है.

 

क्या खाकर खोला जाता है व्रत:

 

यह व्रत दूसरे व्रत से बिलकुल अलग होता है. इसमें 16 से 18 घंटे तक व्रती निर्जला व्रत रखती हैं. पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद के रूप में मिला मौसमी फल, खीरा और मिठाइयां खास तौर पर खाया जाता है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह व्रत कढ़ी-चावल खाकर तोड़ा जाता है जबकि बिहार के कुछ हिस्सों में जौ के सत्तू से बने हलवे से खोला जाता है. अगर हलवा न बने तो सत्तू में गुड़ और घी मिलाकर खाया जाता है. इस दिन मुख्य रूप से मावा गुझिया, सूजी गुझिया, ठेठरा, खुरमी आदि मुख्य रूप में बनते हैं.