निष्पक्ष जन अवलोकन। रामानन्द गुप्ता।
बाराबंकी। आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज धारा 341 के माध्यम से प्रदत्त आरक्षण के अधिकार में लगाए गए धार्मिक प्रतिबंध के खिलाफ संगठन पूरे उत्तर प्रदेश में लोकतांत्रिक तरीके से अपने हक़ की आवाज बुलंद कर रहा है। इसके तहत दिनांक- 10/08/2021. को बाराबंकी जिलाधिकारी कार्यालय में प्रदेश अध्यक्ष वसीम राइन की अगुवाई में राष्ट्रपति को सम्बोधित ज्ञापन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी आफताब आलम को ज्ञापन सौंपा गया। ज्ञापन देने समय प्रदेश अध्यक्ष वसीम राइन ने कहा कि यह प्रतिबंध दलित मुस्लिम की तरक्की के खिलाफ 10 अगस्त 1950 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के जरिये संविधान संशोधन अध्यादेश के माध्यम से लगाये गए थे। कांग्रेस नीत सरकार व लीडरान को गैर हिन्दू- गैर सिख दलित जाति के लोगों के हितों का गला घोंटने से ही संतुष्टि नहीं हुई, वर्ष 1958 में पुनः इस अध्यादेश को संशोधन कराते यह बढ़ोतरी भी कि जिन दलितों के पूर्वज कभी हिदू धर्म से निकल गए थे यदि वह पुनः हिन्दू धर्म स्वीकार करें तो उन्हें भी आरक्षण व अन्य सुविधायें मिलेंगी। 1990 में इस अध्यादेश में एक संशोधन करके इसमें बौद्ध दलितों को भी सम्मलित कर दिया गया। इस प्रकार मुस्लिम एवं ईसाई दलित आज भी अपने आरक्षण के संवैधानिक अधिकार से वंचित हैं जिसे असंवैधानिक तरीके से छीन लिया गया है जो कि संविधान की धारा 14 ,15 ,16 और 25 के विपरीत है। प्रदेश अध्यक्ष वसीम राइन ने पसमांदा समाज से जागने उठ खड़े होने को वक़्त की जरूरत बताया और कहा कि अल्पसंख्यक और सेक्युलरिज़्म के भूत ने हमे आज तक सिर्फ डराया है और हमारा इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहा कि बड़े दर्जे के काबिल-ए-एहतराम मज़हबी नेताओं ने हमे तेजपत्ता बनाकर छोड़ दिया है, और ख़ुद आलू की तरह हर पार्टी में, हर इदारे में, हर संस्था में बड़े पदों पर विराजमान हैं। वसीम राइन ने सवाल किया कि क्या आपने सोचा है कभी, कि अल्पसंख्यक के नाम पर मिलने वाली चूरन तो हमारे ऊंचे दर्जे के मुसलमान भाई ले जाते हैं, पिछड़ों के नाम पर नौकरियों वगेरह में आरक्षण का फायदा पसमांदा को अगर हो भी जाता तो आला हज़रतों ने हमे पढ़ने नही दिया था।उन्होंने बताया कि हम भारत मे रहने वाले देसी- देशभक्त कन्वर्टेड मुसलमान क्या किसी दूसरे मुल्क़ से यहां रहने नही आये थे। हमारे बाप दादा हमारे पूर्वज यहीं के तो हैं, उन्होंने कभी न कभी इस्लाम मज़हब अपनाया होगा, लेकिन क्या उन्होंने इस्लाम अपनाने के साथ साथ, मज़हबी नेताओं की, ग़ुलामी भी क़ुबूल की थी ? अगर नही की थी, तो आज तक हम ग़ुलामी की ज़िंदगी क्यों जीते आ रहे हैं ? हम साइलेंट ग़ुलाम हैं, उन लोगों के जो कहते हैं कि हम बड़े दर्जे के मुसलमान हैं- मदनी हैं या मक्की हैं, और एक हम उनकी ग़ुलामी कर रहे हैं जो कहते हैं कि उन्होंने ही हमे मुसलमान बनाया है। मुसलमानों की 85 फीसद आबादी वाला आज का पसमांदा पिछड़ा मुसलमान जिसे आज तक आगे नही बढ़ने दिया गया है। अपनी सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक और आर्थिक हालत पर ग़ौर करे तो सारी बातें समझ आ जाएंगी। हम ये भूल गए कि हम कन्वर्टेड मुसलमान हैं, और भारत मे रहने वाले बाकी बहुसंख्यक भाई डीएनए की बुनियाद पर हमारे रिश्तेदार हैं, हमारे पूर्वज एक हैं। हमे अपना और अपने बच्चों का भविष्य संवारना है तो इन राजनीतिक पार्टियों की सेक्युलरिज़्म के नाम पर चल रही धोखेबाज़ी को समझना होगा, और हमें अपने राजनीतिक मामलों में अपने बहुसंख्यक भाइयों के साथ मिलकर उन्ही के पीछे चलकर, एक साथ एक मत से अपना मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री चुनना पड़ेगा। उन्होंने अपील की कि सोचो और ग़ौर करके देखो कि पसमांदा और सेक्युलरिज़्म के भूत ने हमे आज तक आरएसएस से सिर्फ डराया और हमारा इस्तेमाल किया है। बड़े दर्जे के काबिल ए एहतराम मज़हबी नेताओं ने हमे तेजपत्ता बनाकर छोड़ दिया है, और ख़ुद आलू की तरह हर पार्टी में, हर इदारे में, हर संस्था में बड़े पदों पर विराजमान हैं। प्रदेश अध्यक्ष ने नारा दोहराया, पिछड़े सब एक समान हिन्दू हो या मुसलमान।
इस अवसर पर आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के जिलाध्यक्ष नसरुद्दीन अंसारी, क़ुरैशी समाज के जिलाध्यक्ष शादाब क़ुरैशी, सलमानी समाज के जिलाध्यक्ष जुबेर अहमद, सईद राइन, खुर्शीद अंसारी, इसराइल राइन, खलील राइन, वरिष्ठ अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन (एडवोकेट), अमान गाजी, अंकुर सिंह आदि उपस्थित रहे।